विवरण
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पूर्ण सामंजस्यपूर्ण मन से हम विराट चेतना की धारा में विलीन होकर अपने पृथक अस्तित्व का त्याग कर सकते हैं और शाश्वत प्रेम के लोक में लौट सकते हैं।जब वे तुम्हारे कानों में युगों पुराना प्रेम-गीत फुसफुसाएँ, तब जान लेना कि तुम स्वर्गिक तारों के लाड़ले हो!जब वे तुम्हारे पूरे अस्तित्व को उस प्रकाश से सजाएँ जो अंधकारमय विचारों को चूर कर दे, तब जान लेना कि तुम सुदूर आकाशगंगाओं के प्रिय हो! तुम और मैं, परम प्रभु की संतानें, चलें,दौड़ें, उड़ चलें। चलें, दौड़ें, उड़ चलें। उड़ो! उड़ो! उड़ो! वहीं लौट चलें, जहाँ हम थे। उड़ो! उड़ो! उड़ो! वहीं लौट चलें, जहाँ हम थे। उड़ो! उड़ो! उड़ो! स्वर्ग लौट चलें...जब वे तुम्हें शाश्वत प्रेम प्रदान करें, ओह! त्रिलोक से परे टिकने वाला आनंद, तब जान लेना कि तुम दिव्य लोक की महारानी बनोगी! तुम और मैं, परम प्रभु की संतानें, जान लो कि तुम ही सर्वोच्च हो! जान लो कि हम ही सर्वोच्च हैं! हम ही सुप्रीम मास्टर हैं!सूर्य ने अपनी आभा बाँट दी, अब संध्या आ पहुँची है। अनछुए उपवन में कुँवारी कली अपनी एकाकी पंखुड़ियाँ समेटती है मकड़ी शीघ्रता से अपना गंभीर जाल बुनती है प्रिय, सो जाओ... मैं यहीं तुम्हें पंखा झलने के लिए हूँ! मेरा हृदय खुला है कि मंद पवन उसमें से गुज़रे। स्वप्नों के सौ पंछी तुम्हारी शय्या पर आ जुटे हैं प्रिय, सो जाओ, कोई सरल-सा सपना देखो दोनों तटों के विलो वृक्ष तुम्हें लोरी सुना रहे हैं... प्रिय, सो जाओ... प्रिय, सो जाओ, कोई सरल-सा सपना देखो दोनों तटों के विलो वृक्ष तुम्हें लोरी सुना रहे हैं... ऊँचे वृक्ष की छाया भी सम्मोहित है। तुम दुःख की कितनी ऋतुओं से होकर गुज़रे हो? अब मेरी बाँहों पर सिर रख दो, मेरे प्रिय, और मुझे विषाद का पका फल गिरने की ध्वनि सुनने दो...जन्म लेना, जीना और फिर विलीन हो जाना – मनुष्य यात्रियों के समान हैं, जो जन्म-मरण के अनंत चक्र में जीवनरूपी सराय में सदा आते-जाते रहते हैं। विशाल आकाश में वर्षा की बूँद और नदी में चाँद के प्रतिबिंब की भाँति, अपने मूल से अनजान रहने तक सब कुछ क्षणभंगुर है। भाग्यशाली हैं वे, जिन्हें किसी संबुद्ध संत का आशीर्वाद प्राप्त होता है, ताकि वे अपने सच्चे स्वरूप को जानकर शाश्वत जीवन पा सकें।जब तुम नाव से पार जाते हो, चाँद अब भी सोया रहता है नदी एक सराय है और चाँद बेफ़िक्र मुसाफ़िर जब तुम नाव से पार जाते हो, चाँद अभी युवा है नदी नहीं जानती कि एक दिन चाँद बूढ़ा हो जाएगा।जब तुम नाव से पार जाते हो, चाँद अब बूढ़ा हो चुका है चाँद सदा ऋणी है, फिर भी नदी को कुछ याद नहींजब तुम नाव से पार जाते हुए नदी की कथा सुनते हो, “हे चाँद, तुम कितने निष्ठुर हो! जहाँ भी जाओ, कृपया शीघ्र लौट आना।”जब तुम नाव से पार जाते हो, जीवन आनंद का उत्सव है मैं सराय बनकर तुम्हारे आने की प्रतीक्षा करूँगा।इस स्थान से गुज़रते हुए तुम्हें इतनी जल्दी क्यों है? मैं लुढ़कता हुआ कंकड़ बनकर तुम्हारे मनोहर कदमों के पीछे चलूँगा।जीवन में मन बहलाते, हम अपना मूल नहीं जानते दोपहर के वृक्ष की लंबी छाया सिमटती है और मेरी भी जीवन में मन बहलाते, हम अपना मूल नहीं जानते मैं स्वयं को वर्षा की उस बूँद में समेट लेता हूँ, जो आकाश तले वाष्प बन जाती है।जब हृदय प्रेम में हो, और संपूर्ण प्रेम सुलभ हो, तो समय और अंतरिक्ष जीवंत और रंगीन हो उठते हैं। प्रिय की आँखों, मुस्कान और झूमती धड़कनों में पूरा संसार समाया होता है।जब से मैंने तुमसे प्रेम किया है, यह देश धरती का सबसे सुंदर स्थान बन गया है! मेरे उपवन में पक्षी आनंद से गाते हैं। मैंने पहले उनका गीत क्यों नहीं सुना?जब से मैंने तुमसे प्रेम किया है, अब किसी और नगर में रहने की इच्छा नहीं; प्रदूषण और जनसंख्या घनत्व की क्या चिंता? इसकी तनिक भी परवाह किसे है?तुम्हारे बिना हर स्थान वैसे भी मरुस्थल ही होगा। इतनी शांति और निर्मल वायु में भी मैं भला साँस कैसे ले सकती हूँ?अब मैं जानती हूँ, सबसे सुंदर स्थान वही है जहाँ तुम और तुम्हारा प्रिय गहरी भावनाएँ और कोमलता बाँटते हो!यद्यपि तुम अब मेरे पास नहीं हो, फिर भी मैं यहाँ आशा के सहारे रहती हूँ! – और कोई विकल्प भी नहीं – तुम जहाँ हो, वहीं मेरा स्वर्ग है! केवल तुम्हारे थोड़ा निकट होना ही पर्याप्त है। मैं यहाँ से नहीं जा सकती! मेरे पाँव और भावनाएँ मेरे उपवन के पेड़-पौधों की तरह जड़ें जमा चुके हैं, वे अपनी इच्छा से हिल नहीं सकते। शायद किसी दिन कोई व्यक्ति या घटना उन्हें कहीं और रोप दे।पर अभी तो वह भविष्य बहुत दूर दिखाई देता है! या फिर?!... सोचने का साहस नहीं होता – पर शायद किसी उज्ज्वल संध्या तुम लौट आओ! क्योंकि मैं तुमसे प्रेम करती हूँ।वाह, वाह, आपको बहुत बहुत धन्यवाद। यह खूबसूरत था। धन्यवाद। खूबसूरत, खूबसूरत, धन्यवाद।











